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Monday, April 27, 2015

प्रजातन्त्र का मखौल + तुम किसके लिये यह माला बना रहे हो?

Baba

~ This email contains material only for Hindi readers ~

This email contains two sections:
1. PS #3234: तुम किसके लिये यह माला बना रहे हो?
2. Article: प्रजातन्त्र का मखौल


प्रजातन्त्र का मखौल + तुम किसके लिये यह माला बना रहे हो?

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हे भक्त! तुम किसके लिये यह माला बना रहे हो?

प्रभात संगीत 3234 कार तारे तुमि माला गाँन्थियाछो, कार पथ पाने चेये आछो…

परिचय- इस गीत में परमपुरुष, सूक्ष्मता पूर्वक भक्त के सामने छद्म रूपमें आकर उससे पूंछते हुए, अपनी लीला कर रहे हैं। इस प्रकार यह गीत परमपुरुष और भक्त के बीच का अनोखा संवाद है जिसमें भक्त के सामने उन्होंने अपनी पहचान छिपा रखी है।

भावार्थ

हे भक्त! तुम किसके लिये यह माला बना रहे हो? तुम किसके लिये अपलक दृष्टि से प्रतीक्षा कर रहे हो। वह तुम्हारा सबसे प्यारा कौन है जो दूर रहकर तुमको इतना रुला रहा है, फिर भी वह तुम्हें सबसे प्यारा है! वह कौन है? वह कौन है जिसको तुम इतना प्यार करते हो कि भूल ही नहीं  सकते? वह सत्ता कौन है जिसके लिये तुम हमेशा  व्याकुल रहते हो और हृदय से ललचा रहे हो?

हे भक्त! वह तुम्हारा प्रेमी कौन है जिसके लिये तुमने दिव्य अमृत, हृदय में एकत्रित कर रखा है और अपना विस्तर सुगंधित फूलों से सजा रखा हैं? वह दिव्य कौन है जो तुम्हारा सबसे प्यारा है।
 वह कौन है जिसके न आने से हृदय में हुए अकथनीय कष्टों को भूलने का प्रयत्न कर रहे हो । और उसके ध्यान में अपने चित्त में चमेली की सुगंध लिये बैठे हो?

हे भक्त!  किसके प्रेम ने तुम्हारे मन को सार्वभौमिक बना दिया है, जिस के कारण तुम अनुभव करने लगे हो कि विश्व के सभी तुम्हारे हैं । कोई भी बाहर का नहीं और न ही कोई दूर है। हृदय में तुम अनुभव करते हो कि सभी मेरे निकट के संबंधी हैं, तुमने अपने हृदय के सभी दरवाजे और खिड़कियाॅं अपने प्रेम को उड़ेलने के लिये और सम्पूर्ण मानवता की सेवा के लिये खोल रखे है।

 हे भक्त! तुम किसके लिये माला बना रहे हो? साधना और ध्यान करते हुए तुम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो तुम्हारा प्रेमी कौन है?

टिप्पणी-


1. चमेली की सुगंध. बाबा ने इस का यहाॅं उदाहरण दिया है यह सुगंध साधना से संबंधित है। प्रारंभ में भक्त को प्रभु से मिलने की बहुत तीब्र इच्छा होती है जो साधना करने पर समाप्त हो जाती है, और उनकी कृपा से इस प्रकार की सुगंध की अनुभूति होती है, और भक्त आध्यात्मिक रूपसे मदहोश  हो जाता है। जब साधक की साधना अच्छी तरह होते हुए  चरम पर पहुंचने लगती है, तो अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्रों से सूक्ष्म ग्रन्थिरस निकलते हैं । जिनकी इस प्रकार की सुगंध होती है जो साधक के मन को शांति  और तृप्ति देती है। इसे साधक ही नहीं अन्य समीपस्थ लोग भी अनुभव करते हैं , यह परमपुरुष की समीपता के प्रभाव से होती है।

इस अवस्था का अन्य विवरण- 1.जो लोग बहुत अधिक साधना और कीर्तन करते हैं, उनके शरीर से इस प्रकार की सुगंध निकलती है जो अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्रों से निकलने वाले हारमोन्स के कारण होती है, वह विल्कुल चमेली या बेला या जुही की तरह तो नहीं होती पर उससे मिलती जुलती होती है।। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह सुगंध निकलना किसी की साधना के स्तर को मापने का साधन है । जब कोई विलकुल एकाॅंत में बैठ कर परमपुरुष के होने का अनुभव करने का प्रयत्न करता है तो उसे हल्की सी सुगंध का अनुभव होता ह। यह कुछ नहीं वल्कि नाक की नोक पर जमे हुए कुछ सुगंध छोड़नेवाले कार्वनिक पदार्थों की गंध होती है। यद्यपि यह पूर्णतः जैवज्ञानिक है पर इसे भगवद्कृपा के अलावा क्या कहा जा सकता है।

2. गंध तन्मात्राओं यथा, शब्द, स्पर्श , रूप, रस, गंध के द्वारा साधक यह सुगंध अनुभव करता है। जब साधना अच्छी तरह होती है तो मन के स्थिर होने पर प्राथमिक स्तर पर मधुर  सुगंध अनुभव होती है।  कभी यह सुगंध कमल के फूल की तरह और कभी अज्ञात फूल की तरह अनुभव में आती है। गंध तन्मात्रा सबसे स्थूल तन्मात्र  मानी जाती है जो परमपुरुष के चक्र-नाभि से निकलती है। परमपुरुष का यह सौदर्य बोध कहा जा सकता है जिस पर अनेक काव्य लिखे जा चुके हैं, यह भौतिक जगत के अनुभव से ऊपर है।।

- Trans: Dr. T.R.S.

Note: If you would like the audio file of the above Prabhat Samgiita kindly write us.

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